Monday, February 9, 2026

Corporate Ego

आज के कॉर्पोरेट और मैनेजमेंट कल्चर में अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग अपनी उपलब्धियाँ, पद या अनुभव को बार-बार बताकर खुद को “सबसे बेहतर” साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या वाकई सच्चा नेता वही होता है जो सबसे ज़्यादा बोलता है या खुद का प्रचार करता है?
हकीकत यह है कि मजबूत नेतृत्व शोर नहीं मचाता।
खामोशी से असर छोड़ता है।


असली ताकत आवाज़ में नहीं, व्यवहार में होती है
कई बार मीटिंग रूम में सबसे ज़्यादा बोलने वाला व्यक्ति ही सबसे ताकतवर नेता नहीं होता। जो मैनेजर हर समय अपने टाइटल, पुराने अचीवमेंट या दूसरों से तुलना करके अपनी श्रेष्ठता जताता है, वह अनजाने में टीम को एक गलत संदेश देता है:
“अगर मैं खुद नहीं बताऊँगा, तो तुम्हें मेरी काबिलियत समझ नहीं आएगी।”
यह संदेश टीम की समझदारी का अपमान है।
यह काम की गरिमा का अपमान है।
और कई बार नेतृत्व की परिपक्वता पर भी सवाल खड़ा करता है।


सच्चे नेता विश्वसनीयता कमाते हैं, प्रचार नहीं करते
मजबूत लीडर अपनी विश्वसनीयता का ढिंढोरा नहीं पीटते। वे इसे अपने काम से साबित करते हैं:
लगातार और सही फैसलों के ज़रिए
शांत लेकिन आत्मविश्वास से भरे व्यवहार से
और ऐसे नतीजों से, जिन्हें अलग से समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती
जब कोई लीडर बार-बार खुद को साबित करने में लगा रहता है, तो फोकस रिज़ल्ट से हटकर ईगो पर चला जाता है।

 टीमवर्क की जगह कंट्रोल हावी हो जाता है। ऐसी स्थिति में टीम भले ही आदेश माने, लेकिन सोचने, सवाल करने और जिम्मेदारी लेने से कतराने लगती है।
आत्मविश्वास शोर नहीं करता, जगह बनाता है
सच्चा आत्मविश्वास कभी आवाज़ ऊँची नहीं करता।
वह दूसरों को आगे बढ़ने की जगह देता है।
वह टीम को परफॉर्म करने, अपनी राय रखने और सीखने का मौका देता है।
परिपक्व संस्थानों में उत्कृष्टता का प्रचार नहीं किया जाता, बल्कि उसे पहचाना जाता है। वहाँ लोग अपने काम से पहचाने जाते हैं, अपने शब्दों से नहीं।

सबसे अच्छे नेता खुद को “सबसे अच्छा” साबित करने में समय बर्बाद नहीं करते।
वे अपनी टीम को बेहतर बनाते हैं।
वे लोगों को सशक्त बनाते हैं, न कि दबाते हैं।
आज के समय में हमें ऐसे ही नेतृत्व की ज़रूरत है —
जो शोर नहीं करता, बल्कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ता है।

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